हर दिन अस्थमा के कई मामले सामने आ रहे हैं. अब इसके इलाज को लेकर एक और उम्मीद जगी है. एक क्लिनिकल ट्रायल से बेनरालिज़ुमैब, एक मोनोक्लोनल एंटीबॉडी की प्रभावशीलता का पता चला है. इससे पता चला है कि एंटीबॉडी थेरेपी कहीं न कहीं अस्थमा को ठीक करने में मदद कर सकती है. इसकी मदद से हाई डोज वाले स्टेरॉयड ट्रीटमेंट की जरूरत को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
गंभीर अस्थमा का समाधान
अस्थमा वैश्विक स्तर पर लगभग 30 करोड़ लोगों को प्रभावित करता है. इसके लगभग 5 प्रतिशत मरीजों को हर दिन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. ऐसे में गंभीर अस्थमा को मैनेज करने और अक्सर सूजन को कंट्रोल करने और फेफड़ों में बलगम के उत्पादन को कम करने के लिए स्टेरॉयड की हाई डोज लेनी पड़ती है. हालांकि, हाई स्टेरॉयड लेवल से जुड़े जोखिम भी कई सारे होते हैं जैसे कि डायबिटीज, फ्रैक्चर आदि. लेकिन इस थेरेपी से इससे बचा जा सकता है.
मोनोक्लोनल एंटीबॉडी ट्रीटमेंट
ये स्टडी एस्ट्राजेनेका ने फंड की है. इसमें चार फेज में क्लिनिकल ट्रायल किए गए थे. बेनरालिजुमैब नाम के प्रोटीन एंटीबॉडी ने इस बीमारी को अच्छे से टारगेट किया है. इस एंटीबॉडी की मदद से इओसिनोफिल्स के रूप में जानी जाने वाली सूजन पैदा करने वाली इम्युनिटी सेल्स की संख्या को कम किया जा सकता है. ये अक्सर गंभीर अस्थमा के मामलों में बढ़ जाती है.
200 से ज्यादा रोगियों पर हुए ट्रायल्स
ये ट्रायल्स यूरोप भर में 200 से ज्यादा रोगियों पर किए गए हैं. इसमें सामने आया कि 92 प्रतिशत प्रतिभागियों ने सुरक्षित रूप से सांस के स्टेरॉयड का उपयोग कम कर दिया है. जबकि 60 प्रतिशत से ज्यादा लोग ऐसे रहे जिन्हें इसकी बिल्कुल भी जरूरत नहीं पड़ी.
हालांकि परिणाम आशाजनक होने के बाद भी शोधकर्ताओं ने सावधानी बरतने के लिए कहा है. गंभीर इओसिनोफिलिक अस्थमा वाले मरीज अभी भी पारंपरिक स्टेरॉयड ट्रीटमेंट पर भरोसा करते हैं, ऐसे में उसे छोड़कर एंटीबॉडी ट्रीटमेंट पर स्विच करना उन्हें नुकसान कर सकता है. इसलिए ट्रीटमेंट लेते समय सावधानी बरतने की सलाह दी गई है.