

सोशल मीडिया पर अक्सर सेलेब्रिटीज के पुराने इंटरव्यू क्लिप्स या तस्वीरें वायरल होती रहती हैं. कुछ दिन पहले बॉलीवुड एक्टर अक्षय कुमार की क्रिकेटर शिखर धवन के साथ उनके पॉडकास्ट की एक पुरानी क्लिप सोशल मीडिया पर काफी शेयर हो रही थी. वीडियो में अक्षय अपने बेटे आरव के बारे में बात रहे थे. उन्होंने शिखर से कहा, "मेरा बेटा 15 साल की उम्र में बाहर निकल गया....वह खुद अपने कपड़े धोता है....खाना बनाता है......बर्तन मांजता है."
उन्होंने कहा कि वह खुश हैं जैसे उन्होंने और ट्विंकल ने आरव की परवरिश की है. वह बहुत सामान्य बच्चा है. अक्षय कुमार और ट्विंकल खन्ना आज बहुत से माता-पिता के लिए मिसाल पेश कर रहे हैं. उन्होंने सभी एशो-आराम होते हुए भी अपने बेटे को आत्मनिर्भर बनाया है जिससे वह हर तरह की स्थिति में अपना ख्याल रख सकता है. पैरेंटिंग पर की गई कई स्टडीज इस बात का दावा करती हैं कि बच्चे को जितनी जल्दी अपना काम खुद करने का हौसला दिया जाता है वह उतना ही आत्मविश्वासी बनता है.
जबकि जो बच्चे अपने हर छोटे-बड़े काम के लिए माता-पिता या हाउसहेल्प पर निर्भर रहते हैं, उन बच्चों के लिए अपने कॉलेज या जॉब के लिए अकेले हॉस्टल या पीजी में रहना बहुत मुश्किल होता है. बहुत बार तो बच्चे माता-पिता पर इतने निर्भर होते हैं कि अकेले पड़ने पर वे एंग्जायटी और क्रिटिकल मामलों में डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं. अब सवाल आते हैं कि आखिर बच्चे को किस उम्र से आत्मनिर्भर बनाना शुरू करें और किस तरह उन्हें आत्मविश्वासी और इमोशनली मजबूत बनाएं.
इस बारे में GNT Digital ने पिडियाट्रिक्स डॉक्टर स्वाति छाबड़ा से बातचीत की. यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर की इंचार्ज और कंसल्टेंट डॉ स्वाति छाबड़ा को पीडियाट्रिक्स और डेवलपमेंट पिडियाट्रिक्स में 10 साल का अनुभव है.
किस उम्र से करें बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की शुरुआत
डॉ. छाबड़ा ने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के सवाल पर बताया कि बच्चों में यह गुण बहुत कम उम्र से ही डाले जा सकते हैं. इसके लिए आपको बच्चे के आसपास का माहौल ऐसा रखना होगा कि उसके लिए अपना काम खुद करना नॉर्मल बात हो. जैसे जब बच्चा दो-तीन साल का होता है तो उसे खेल-खेल में प्रोत्साहित करें कि वह अपने खिलौने खुद समेट कर रखे. उसे अपनी चीजों को इस्तेमाल करने के बाद वापिस उनकी जगह पर रखना सिखाएं.
बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उन्हें स्वतंत्रता भी दें. डॉ. छाबड़ा ने कहा कि बच्चे जब अपने काम जिम्मेदारी से करने लगें तो उनकी सराहना करें और उन्हें बताएं कि वह अच्छा कर रहे हैं. इसी क्रम में धीरे-धीरे उन्हें कुछ चीजें खुद करने के लिए कहें. जैसे सुबह स्कूल के लिए उन्हें खुद तैयार होने दें, उन्हें अपना बैग तैयार करने दें. इससे उनका खुद को लेकर कॉन्फिडेंस बढ़ेगा.
किस उम्र से बच्चों को जिम्मेदारी देनी चाहिए
डॉ छाबड़ा का कहना है कि पांच साल तक के बच्चों को भी बहुत से माता-पिता हर चीज हाथ में देते हैं. खुद उन्हें खाना खिलाते हैं. यह बात कभी-कभी के लिए सही है लेकिन रोजमर्रा में ऐसा करने से आप बच्चे को खुद पर निर्भर कर रहे होते हैं. इसकी बजाय आपको बच्चे को खुद अपना खाना सफाई से खाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. यहां तक कि बच्चों को अपने बेड़ को साफ रखना भी सिखाएं. डॉ. छाबड़ा ने आगे कहा कि छह साल की उम्र से आप बच्चों को अपना हेमवर्क खुद करने के लिए प्रेरित करें. जरूरत पड़ने पर ही उनकी मदद करें.
इसके अलावा, बच्चों को घर के छोटे-बड़े काम बताएं जैसे खाने के समय डाइनिंग टेबल सेट करने में वे मदद कर सकते हैं. खाने के बाद बर्तन उठाकर सिंक में रख सकते हैं. यहां पर एक और बात पर डॉ. छाबड़ा जोर देती हैं. उनकी सलाह है कि आज भी कई घरों में जब बच्चों से काम कराने की बात आती है तो लड़कों से ज्यादा लड़कियों को घरेलु काम बताए जाते हैं. लेकिन यह गलत है. आपको अपने बेटा और बेटी, दोनों को लाइफ स्किल्स सिखाने पर जोर देना चाहिए ताकि बड़े होकर अगर उन्हें अकेला रहना पड़े तो वे मेंटली ही नहीं बल्कि स्किल्स के मामले में भी तैयार हों.
बच्चों को कम उम्र से निर्णय लेना सिखाएं
डॉ. छाबड़ा कहती हैं कि हर एक बच्चा अलग होता है. कुछ बच्चे बहुत तेज होते हैं जो जल्दी सबकुछ सीख जाते हैं. लेकिन कुछ बच्चों को टाइम लगता है. माता-पिता को बहुत धैर्य से काम लेना चाहिए. बात जब निर्णय लेने की होती है तो बच्चों को सिंपल चीजें डिसाइड करने के लिए कहें जैसे उन्हें क्या कपड़े चाहिए, लंच या डिनर में उन्हें क्या खाना है. हालांकि, जब बच्चे 10-11 साल के हो जाते हैं तो आप उन्हें और चीजें करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं. जैसे वे आपके बिजी होने पर आपका फोन उठा सकते हैं, कॉलर का मैसेज आपको दे सकते हैं.
और अगर कभी बच्चे कुछ गलत निर्णय लें तो उनपर गुस्सा करने या उन्हें डांटने की बजाय उन्हें बताएं कि वह कहां गलत हैं और क्या कर सकते थे. उन्हें सही-गलत के बारे में बताएं और उनकी पूरी बात सुनें. डॉ. छाबड़ा का कहना है कि बच्चों को गलत करने पर डांटना या एक उम्र के बाद बच्चों को पूरी तरह से छोड़ देना, दोनों ही सही नहीं हैं. बच्चे बड़े हो जाएं तो कोशिश करें कि आप उनकी ज़िंदगी में जरूरत से ज्यादा दखलअंदाजी किए बिना उन्हें गाइड करें. माता-पिता और बच्चों के बीच सही कम्यूनिकेशन होते रहना जरूरी है. इससे बच्चों को अपने माता-पिता पर कॉन्फिडेंस रहता है कि वे उनकी हर बात सुनेंगे और समझेंगे.
बच्चों को सुनना है जरूरी
डॉ. छाबड़ा का कहना है कि बच्चा चाहे छोटा हो या बड़ा, आपको उसकी बातों का और सोच का सम्मान करना चाहिए. अगर आप बच्चे को एक ऐसा माहौल देंगे जहां वह अपनी सभी बातें आपको बता सके तो आप उन्हें स्वतंत्र बनाने के साथ-साथ सुरक्षित भी रख सकेंगे. इसके लिए जरूरी है कि आप बच्चे की हर छोटी से छोटी बात को ध्यान से सुनें. उसके हर छोटे-बड़े संदेह को प्यार से सॉल्व करें. जरूरत पड़ने पर बच्चों के साथ सख्त भी रहें लेकिन यह सख्ती इतनी न हो कि वे आपसे भागने लगें. इसलिए जरूरी है कि आप उन्हें सुनें. गलती होने पर उन्हें छोटा महसूस कराने या उनके साथ गुस्से से पेश आने की बजाय उन्हें अच्छे तरीके से समझाएं. इससे उन्हें लगेगा कि उनके माता-पिता उन्हें सपोर्ट करते हैं.
डिजिटल युग में बच्चों को रखें रिएलिटी से कनेक्टेड
डॉ. छाबड़ा कहती हैं कि आजकल माता-पिता बच्चों की ज़िंदगी में इतने ज्यादा इनवॉल्व हैं कि उनके दोस्त भी वे खुद तय करना चाहते हैं. जबकि हर एक बच्चे को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे खुद अपने दोस्त चुनें. माता-पिता अपने बच्चों और उनके दोस्तों के बारे में जानकारी रखें कि वे क्या करते हैं लेकिन हेल्दी तरीके से. ताकि बच्चों को यह न लगे कि उनपर 24 घंटे सर्विलेंस हो रही है. इसके अलावा, आज की सबसे बड़ी परेशानी है डिजिटल युग, जहां बच्चे बहुत सी ऐसी चीजों के बारे में जान रहे हैं जो उनकी उम्र के हिसाब से ठीक नहीं हैं.
डॉ. छाबड़ा सलाह देती हैं कि ऐसे में बच्चों को टेक्नोलॉजी के साथ एक सीमित समय ही दें. ध्यान रखें कि वे कुछ ऐसा नहीं देख रहे जो उनकी उम्र के लिए सही नहीं है. अगर कभी ऐसा हो भी तो उनसे बात करें, उनसे चीजें छिपाने की बजाय उनके सवाल सुनें और उन्हें समझाने की कोशिश करें. बच्चों को तकनीक या सोशल मीडिया से ज्यादा रियल दुनिया से कनेक्टेड रखें और ऐसा तब होगा जब माता-पिता खुद पर कंट्रोल करेंगे. घर में सबके लिए रूल बनाएं कि इस समय के बाद कोई फोन या टैब नहीं देखेगा बल्कि सभी साथ में कोई एक्टिविटी जैसे किताबें पढ़ना, कोई बोर्डगेम खेलना आदि करेंगे.