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Manoj Kumar passes away: एक्टर-डायरेक्टर होने के साथ-साथ कमाल के होम्योपैथ भी थे OG 'भारत कुमार'... कई बड़ी हस्तियां लेती थीं कंसल्टेशन

अपनी देशभक्ति फिल्मों के लिए जाने जाने वाले, मनोज कुमार ने हरियाली और रास्ता, वो कौन थी, हिमालय की गोद में, दो बदन, पत्थर के सनम, नील कमल और क्रांति जैसी क्लासिक फिल्मों से भी पहचान बनाई.

Actor Manoj Kumar aka Bharat Kumar (Photo: X/@FilmHistoryPic) Actor Manoj Kumar aka Bharat Kumar (Photo: X/@FilmHistoryPic)

दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार का 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया है. उन्होंने कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में अंतिम सांस ली. हिंदी सिनेमा में वह शहीद (1965), उपकार (1967), और पूरब और पश्चिम (1970) सहित अपनी देशभक्ति फिल्मों के लिए जाने जाते थे. उन्हें बॉलीवुड में उनके योगदान के लिए 1992 में पद्म श्री मिला और बाद में 2015 में प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 

अपनी देशभक्ति फिल्मों के लिए जाने जाने वाले, मनोज कुमार ने हरियाली और रास्ता, वो कौन थी, हिमालय की गोद में, दो बदन, पत्थर के सनम, नील कमल और क्रांति जैसी क्लासिक फिल्मों से भी पहचान बनाई. 1960 और 70 के दशक की शुरुआत में, कुमार ने सिनेमा के माध्यम से देश के प्रति अपनी भक्ति और प्रेम को दिखाया. उन्हें धरतीपुत्र के रूप में जाना जाने लगा और सिनेप्रेमियों ने उन्हें ‘भारत कुमार’ का नाम दिया. 

मनोज कुमार ने अपनी पहली निर्देशित फिल्म उपकार (1967) के साथ देशभक्ति फिल्मों की एक नई शैली की शुरुआत की, जो उनकी भगत सिंह की बायोपिक शहीद (1965) के ठीक बाद आई थी. उन्होंने पूरब और पश्चिम (1970), शोर (1972) और रोटी, कपड़ा और मकान (1974) जैसी फिल्मों के साथ तिरंगा फहराया. उनकी फिल्मों ने न केवल हर भारतीय में गर्व की भावना पैदा की, बल्कि उन्होंने अपने सामाजिक संदेशों के साथ दर्शकों के मन में एक गहरी छाप भी छोड़ी. 

कमाल के होम्योपैथ भी थे मनोज कुमार 
लेकिन क्या आपको पता है कि मनोज कुमार न सिर्फ एक एक्टर और डायरेक्टर बल्कि होम्योपैथ भी थे. जी हां, यह जानकर आपको हैरानी होगी लेकिन मनोज कुमार होम्योपैथी के अच्छे जानकार थे और कहा जाता है कि अपने साथी एक्टर्स के साथ-साथ कई जाने-माने राजनेता भी उनसे बीमार होन पर सलाह लेते थे. 'द लीजेंड्स ऑफ बॉलीवुड' के लेखक राज ग्रोवर ने अपने एक इंटरव्यू में उनके इस हुनर का जिक्र किया था. 

राज ग्रोवर ने बताया कि मनोज अपने एक करीबी रिश्तेदार के. प्रहलाद के पास गए, जो बॉम्बे में एक मशहूर होम्योपैथिक डॉक्टर थे. मनोज को होम्योपैथी इलाज से आराम मिला तो उन्होंने इस पद्धिति को सीखने की ठानी और वह प्रहलाद के ही शिष्य बन गए. मनोज ने मशहूर अभिनेता अशोक कुमार से भी होम्योपैथिक के बारे में सीखा, जो होम्योपैथी के अच्छे जानकार थे. मनोज बाद में वे होम्योपैथी में इतने पारंगत हो गए कि फिल्म इंडस्ट्री के दूसरे लोगों के साथ-साथ अशोक कुमार भी होम्योपैथिक इलाज के लिए उनके पास आते थे. 

पिता से मिली देशभक्ति की भावना 
24 जुलाई, 1937 को पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत के लाहौर के एबटाबाद (तब हिंदुस्तान का हिस्सा) में हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी के रूप में जन्मे कुमार को विभाजन के दौरान अपने परिवार के साथ अपनी जड़ों से दूर होना पड़ा. 10 साल की उम्र में वह अपने परिवार के साथ दिल्ली के एक रिफ्यूजी कैंप में आए. उनका बचपन आसान नहीं था. रिफ्यूजी होने का दर्द और इस सबके बीच उन्होंने अपने दो महीने के भाई को खो दिया क्योंकि उस समय डॉक्टर हड़ताल पर थे. 

लेकिन उनके पिता एचएल गोस्वामी ने जीवन में कड़वाहट नहीं आने दी. यहां तक कि बाद में, कुमार ने उन्हें अपने अंदर देशभक्ति की भावना भरने का श्रेय दिया. टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए अपने एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने खुलासा किया कि उनके पिता दिल्ली में उनके शरणार्थी शिविर के अध्यक्ष थे और शिविर के निवासी चाहते थे कि वे पंडित जवाहरलाल नेहरू से पानी और बिजली की आपूर्ति मांगें, जो शिविर का दौरा कर रहे थे. इसके बजाय, उनके पिता ने नेहरू से कहा, "कश्मीर पर आक्रमण हो चुका है. मुझे बताइए, आपको हमारे कैंप से कितने जवान चाहिए?"

इस तरह बचपन से ही उनके मन में देशभक्ति के बीज पनप चुके थे. बहुत कम उम्र से ही उन्होंने छोटे-मोटे काम करना शुरू किया ताकि घर चलाने में मदद मिले. पर उन्हें फिल्मों से प्यार था. वह दिलीप कुमार के इतने दीवाने थे कि उनकी 'शबनम' फिल्म के बाद अपना नाम मनोज रख लिया. मनोज कुमार अपनी किस्मत आजमाने मुंबई पहुंचे और 1957 में 'फैशन' फिल्म में उन्हें छोटा सा रोल करने का मौका मिला. इसके बाद उन्होंने 'गंगु तेली' डॉक्यूमेंट्री में काम किया. 1961 में आई 'कांच की गुड़िया' बतौर लीड एक्टर उनकी पहली फिल्म थी. 

शास्त्रीजी के सुझाव पर बनाई फिल्म 
फिल्मों में अपनी जगह बनाना मनोज कुमार के लिए आसान नहीं था लेकिन उन्होंने अपना एक अलग मुकाम बना लिया. बहुत वक्त तक उन्होंने गुमनाम लेखक के तौर पर भी काम किया ताकि अपना खर्च चला सकें. 1962 में आई 'हरियाली और रास्ता' फिल्म से उन्हें सफलता मिली. धीरे-धीरे उन्होंने देशभक्ति से भरी फिल्मों के जरिए अपना रास्ता बनाया. 1965 से 1974 तक कुमार ने ऐसी फिल्में बनाईं, जो लोगों के दिल को छू गईं. 

Dadasaheb Phalke Award to Manoj Kumar in 2016 (Wikipedia)

देश के प्रति समर्पित होने के साथ-साथ वे एक स्मार्ट फिल्म निर्माता भी थे. उनकी फिल्में शहीद (1965), जो स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह को श्रद्धांजलि थी, उपकार (1967), जो किसानों और सैनिकों दोनों को राष्ट्रीय नायक के रूप में मनाती थी, और पूरब और पश्चिम (1970) 1962 के चीन-भारत युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद आई थीं. 'उपकार' फिल्म प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के सुझाव पर बनाई गई थी, जिन्हें कुमार की शहीद बहुत पसंद थी. यह फिल्म शास्त्रीजी के नारे “जय जवान, जय किसान” को प्रचारित करने के लिए बनी दी, लेकिन काफी सफल रही. 

इन फिल्मों ने उन्हें 'भारत कुमार' नाम दिया. हालांकि, मनोज कुमार ने एक बार बताया था कि ‘भारत’ नाम को जीना कितना मुश्किल था. अभिनेता ने एक बार राज्यसभा टीवी को बताया था, “बड़ा बोझ है इस नाम का मुझपर. एक बार मैं एक रेस्टोरेंट में था और सिगरेट पी रहा था. एक लड़की मेरे पास आई और मुझे डांटते हुए बोली, ‘तुम्हें शर्म नहीं आती? तुम भारत होने के बावजूद सिगरेट पी रहे हो?’ साथ ही, मैं फिल्मों में हीरोइन को छूने से भी डरता था, क्योंकि मुझे लगता था कि लोग बुरा मान जाएंगे.” 

आज भले ही मनोज कुमार हमारे बीच न हो लेकिन उनकी विरासत हमेशा अमर रहेगी. वह हमेशा हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री के ओजी (ओरिजिनल) भारत कुमार रहेंगे.