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Manoj Kumar Passes Away: दिल्ली का वह गांव जहां हुई थी मनोज कुमार की फिल्म उपकार की शूटिंग, ग्रामीणों के बीच आज भी ताज़ा हैं यादें

नांगल ठाकरान के रहने वाले महेंद्र सिंह बताते हैं कि फिल्म उपकार की शूटिंग उनके दादा चौधरी झूमन सिंह के खेतों में हुई थी. इस फिल्म का मशहूर गाना 'मेरे देश की धरती सोना उगले' आज भी लोगों की जुबां पर आ जाता है. लेकिन नांगल ठाकरान गांव की याद्दाश्त में इस फिल्म की शूटिंग अब भी ताज़ा है.

Upkar Film Shooting Upkar Film Shooting
हाइलाइट्स
  • मनोज कुमार का 87 साल की उम्र में निधन

  • 1967 में रिलीज हुई थी फिल्म उपकार

बॉलीवुड के दिग्गज कलाकार मनोज कुमार अब हमारे बीच में नहीं हैं. उनके निधन से पूरे देश में शोक की लहर है. साल 1967 में आई उनकी फिल्म उपकार आज तक सबको याद है. इस फिल्म के कुछ हिस्सों की शूटिंग दिल्ली के नांगल ठाकरान गांव में हुई थी. खास बात यह है कि गांव के लोगों के दिल-ओ-दिमाग में अब भी शूटिंग की यादें ताजा हैं. 

नांगल ठाकरान के रहने वाले महेंद्र सिंह बताते हैं कि फिल्म उपकार की शूटिंग उनके दादा चौधरी झूमन सिंह के खेतों में हुई थी. इस फिल्म का मशहूर गाना 'मेरे देश की धरती सोना उगले' आज भी लोगों की जुबान पर आ जाता है. महेंद्र सिंह और गांव के दूसरे लोग बताते हैं कि यह संयोग ही था कि मनोज कुमार ने फिल्म उपकार की थोड़ी शूटिंग उनके खेतों में की थी.

कहां है नांगल ठाकरान गांव? 
नांगल ठाकरान गांव उत्तरी दिल्ली के नरेला ब्लॉक में मौजूद है. आज भी हरे-भरे खेत इस गांव की पहचान हैं. उस समय भी थे जब मनोज कुमार की फिल्म उपकार के कुछ हिस्सों की शूटिंग के लिए इसे चुना गया था. 

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चौधरी झूमन सिंह के पोते महेंद्र सिंह समाचार एजेंसी पीटीआई के साथ खास बातचीत में कहते हैं, "वे झरियापुर में एक झाल है, नहर पर, वो वहां आए थे सिर्फ धानों का सीन लेने के लिए, वहां धानों की फसल थोड़ी थी. वहां किसी ने उन्हें बताया कि नांगल ठाकरान चले जाओ चौधरी झूमन के पास. वे बड़े जमींदार हैं, ज्यादा धान लगा रहे हैं, वहां चले जाओ." 

महेंद्र सिंह बताते हैं, "उन्होंने हमारा धानों का खेत देखा, बातचीत की और चले गए. थोड़ी देर बाद वे फिर आ गए और कहा हम फिर आएंगे दो-तीन दिन में. दो-तीन दिन बाद वे शूटिंग का पूरा सामान लेकर यहां आए." 

ग्रामीण ने साझा कीं शूटिंग से जूड़ी यादें
उपकार फिल्म की शूटिंग नांगल ठाकरान गांव में चौधरी झूमन सिंह के खेतों के कारण संभव हो पाई. गांव के एक निवासी पंडित उमेश प्रकाश बताते हैं, "1967 में मनोज कुमार जी उपकार फिल्म बनाने के लिए यहां आए थे. हमारा गांव इसलिए मशहूर था क्योंकि हमारे यहां कृषि पंडित थे चौधरी झुमन सिंह. उन्हें पंडित नेहरू ने यह उपाधि दी थी." 

वह बताते हैं, "हमारा गांव प्रसिद्ध था इसलिए वे हमारे गांव में आए थे कि यहां जमीनदार अच्छे हैं. काफी पैदावार होती थी. उनके खेतों में बहुत शूटिंग होती थी. वे सुबह हमारे घर आते थे और शाम तक यहीं रहते थे. प्राण (एक्टर) लंगड़ाने वाले शूट के लिए अपने पैर यहीं आकर बांधते थे. वह हमारे घर में ही शूट किया गया था. वे मेरी मां से मक्खन, दही, लस्सी ले लेते थे बाकी खाना तो उनका बाहर से ही आता था." 

मनोज कुमार को महेंद्र सिंह के दादा ने अपनी फिल्म की शूटिंग के लिए एक घर भी ऑफर किया था. महेंद्र सिंह उस दौर में बहुत छोटे थे हालांकि उन्हें इस घर में शूट किए गए कुछ सीन अच्छी तरह याद हैं. वह बताते हैं, "हमारे इसी मकान में उन्होंने शूटिंग की थी. इसमें चोरी का सीन था. चक्की चलाने का सीन था. दोनों भाइयों प्रेम चोपड़ा और मनोज कुमार के बीच आपस में कहासुनी होती है. कामिनी कौशल बैठकर देखती हैं." 

जब बीच में रोकनी पड़ गई थी शूटिंग
गांव वालों को याद है कि जैसे ही फिल्म की शूटिंग की खबर आस-पास के इलाकों में फैली, बड़ी संख्या में लोग शूटिंग देखने के लिए आ गए थे. इनमें ज्यादातर कॉलेज के छात्र थे जिसकी वजह से थोड़ा हंगामा हुआ और शूटिंग बीच में रोकनी पड़ गई. पंडित उमेश प्रकाश बताते हैं, "शूटिंग के दौरान अलीगढ़, मेरठ, हिसार, चंडीगढ़ से कई कॉलेज के छात्र आ जाते थे. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस बुलानी पड़ती थी. कई बार शूटिंग रोकनी पड़ती थी, ताकि वे चले आएं. हालांकि वे दोबारा लौट आते थे." 

रिलीज़ के बाद फिल्म देखने गए थे ग्रामीण 
उपकार रिलीज होने के बाद चौधरी झूमन सिंह के परिवार के सदस्यों और दूसरे ग्रामीणों को याद है कि उन्हें फिल्म देखने के लिए टिकट मिले थे. पंडित उमेश प्रकाश बताते हैं, "जब पहली बार दिल्ली में फिल्म रिलीज हुई थी तो हमारे गांव के लोग इसे देखने गए थे. हमें इसे देखने के लिए टिकट मिले थे. शुरुआत में ही लिखा था, "हम चौधरी झूमन सिंह और नांगल ठाकरान के ग्रामीणों के आभारी हैं. लोगों ने बहुत दिलचस्पी दिखाई थी. आसपास के बहुत से लोग इसे देखने आए थे." 

फिल्म के हिट होने के बाद गांव के कुछ लोग मनोज कुमार से मिलने मायानगरी मुंबई भी गए थे. उमेश प्रकाश के पोते आकाश भारद्वाज ने बताया, "बचपन से कहानियां सुनी हैं कि हमारे घर पर उपकार की शूटिंग हुई है. मनोज कुमार जी यहां पर आए यहां पर रहे. अपने क्रू के साथ और यहां पर बहुत सारे विदेशी भी आते थे." 

वह कहते हैं, "तो एक दिन हम लोग मुंबई में थे तो मेरे दादाजी ने मुझे एड्रेस दिखाया. उन्होंने कहा कि मैं उन्हें वहां लेकर चलूं. मैंने कहा छोड़ो ना, मैंने कहा बहुत टाइम हो गया है. वह बोले नहीं, तू मुझकर लेकर चल. मैं मुंबई इसलिए आया हूं. मुझे फिर जाना ही था. तो हम जुहू के एड्रेस पर गए. वहां (मनोज कुमार के घर में) बड़े सम्मान से हमारा स्वागत हुआ, लेकिन 5-10 मिनट पहले ही वह निकल चुके थे."

फिल्म उपकार की कहानी मनोज कुमार ने ही लिखी थी और उन्होंने ही इसका निर्देशन भी किया था. फिल्म की कहानी दो भाइयों की थी जिनकी भूमिका मनोज कुमार और प्रेम चोपड़ा ने निभाई थी. फिल्म में दोनों भाई अलग-अलग रास्ते पर चलने का फैसला करते हैं. मनोज कुमार ने भारत को रोल निभाया था जो पढ़ा लिखा होकर भी गांव में रहकर खेतों में काम करना पसंद करता है. 

प्रेम चोपड़ा ने पूरन का रोल निभाया था जो उस शहर में वापस जाना चाहता है जहां से उसने पढ़ाई की थी. नांगल ठाकरान के ग्रामीणों और खास तौर पर झूमन सिंह के परिवार के लिए, यह फिल्म भावनात्मक रूप से उन्हें मनोज कुमार से जोड़ती है. मनोज कुमार के निधन से ये पूरा गांव सदमे में है और भीगी आंखों से उन्हें याद कर रहा है.