
गाड़ी चलते समय नींद की झपकी आने से अब हादसा नहीं होगा. दरअसल, सड़क दुर्घटनाओं और उनमें होने वाले मौतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार सरकार ने बड़े पैसेंजर वाहनों में एडवांस सेफ्टी फीचर्स अनिवार्य करने का निर्णय लिया है.
सड़क दुर्घटनाओं की बड़ी वजहों में से एक है ड्राइवर की नींद की झपकी. हाईवे पर ड्राइविंग करते समय अगर ड्राइवर को नींद आ जाए तो यह एक बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है. इस समस्या को ध्यान में रखते हुए सरकार ने बड़े पैसेंजर वाहनों में एडवांस सेफ्टी फीचर्स लगाने का निर्णय लिया है.
क्या है उद्देश्य
अप्रैल 2026 से बसों और ट्रकों में एडवांस ड्राइविंग असिस्टेंस सिस्टम (ADAS), इमरजेंसी ब्रेकिंग सिस्टम (EBS), ड्राइवर ब्राउजिनेस एंड अटेंशन वार्निंग सिस्टम (DDAWS) और लेन डिपार्चर वार्निंग सिस्टम (LDWS) जैसे फीचर्स अनिवार्य होंगे. इन फीचर्स का उद्देश्य ड्राइवर को किसी भी इमरजेंसी स्थिति में अलर्ट करना और दुर्घटनाओं को रोकना है.
इमेंरजेंसी ब्रेकिंग सिस्टम
इमेंरजेंसी ब्रेकिंग सिस्टम एक बेहद ही जरूरी सेफ्टी फीचर है. ये सिस्टम संभावित आगे की टक्करों का पता लगाएगा और यदि चालक तुरंत प्रतिक्रिया नहीं करता है, तो वाहन को धीमा करने और टक्कर के प्रभाव को कम करने के लिए ब्रेक अप्लाई करेगा. ताकि किसी भी तरह के दुर्घटना से बचा जा सके और लोगों की जान बचाई जा सके.
ड्राइवर ड्रॉजिनेस एंड अटेंशन वार्निंग सिस्टम
ड्राइवर ड्रॉजिनेस एंड अटेंशन वार्निंग सिस्टम ड्राइवर की आंखों और सिर की हरकतों पर नज़र रखता है. यह सिस्टम इन्फ्रारेड लाइट से लैस कैमरों का उपयोग करके ड्राइवर की आंखों पर नज़र रखता है मसलन चालक की आखें कहां देख रही हैं, वे कितनी खुली हैं और कितनी देर तक देख रही हैं. ये सिस्टम चालक के नींद में आने की स्थिति में एक्टिव होता है. यदि सिस्टम को यह पता लगता है कि चालक को नींद आ रही है तो वो उसे तत्काल अलर्ट करने के लिए ड्राइवर अटेंशन वार्निंग को ट्रिगर करता है. ताकि वाहन उसके कंट्रोल से बाहर न हो जाए. इसके लिए लाइट, साउंड और अलार्म का प्रयोग किया जा सकता है.
लेन डिपार्चर वार्निंग सिस्टम
अपनी लेन में ड्राइविंग करना बेहद ही जरूरी होता है. इस LDWS सिस्टम में कैमरे या सेंसर होते हैं जो सड़क पर लेन मार्किंग (जैसे कि सफेद या पीले रंग की लाइनें) को पहचानते हैं. जब वाहन बिना संकेत (इंडिकेटर) दिए अपनी लेन से बाहर निकलने लगता है, तो सिस्टम ड्राइवर को चेतावनी देने के लिए अलार्म या वाइब्रेशन का उपयोग करता है. हालांकि यह सिस्टम सड़क के प्रकार और लेन मार्किंग की स्थिति पर निर्भर करता है. यह सिस्टम ड्राइवर को मदद करता है, लेकिन ड्राइवर को हमेशा सड़क पर ध्यान देना चाहिए और सुरक्षित रूप से गाड़ी चलानी चाहिए.
ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग सिस्टम
ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग सिस्टम (BSMS) एक बेहद ही जरूरी सेफ्टी फीचर्स में से एक है. BSM सिस्टम में कार के साइड और रियर पर अल्ट्रासोनिक या रडार सेंसर लगे होते हैं जो आसपास के क्षेत्र में वस्तुओं का पता लगाते हैं. ये सिस्टम ड्राइवर को वाहन के पीछे और साइड में मौजूद ब्लाइंड स्पॉट में आने वाले वाहनों या वस्तुओं का पता लगाने में मदद करती है. जब सिस्टम किसी व्हीकल या ऑब्जेक्ट का पता लगाता है, तो यह ड्राइवर को साइड मिरर में एक इंडिकेटर लाइट या वार्निंग साउंड के माध्यम से अलर्ट करता है. जिससे लेन बदलने समय सड़क पर मौजूद अन्य वाहनों से टकराने का खतरा कम हो जाता है.
बसों के साथ ट्रकों पर भी लागू होंगे ये निमय
सड़क परिवहन मंत्रालय ने केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में संशोधन की रूप रेखा तैयार कर ली है. मंत्रालय की तरफ से जारी मसौदा अधिसूचना के मुताबिक, ये सेफ्टी फीचर्स अक्टूबर 2026 से बनने वाले वाहन मॉडलों में लागू होंगे. खास बात यह है कि ये नियम बसों के साथ-साथ ट्रकों पर भी लागू होंगे.
सड़क सुरक्षा के लिए मील का पत्थर साबित होगा यह कदम
सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस साल जनवरी के महीने में इन नए सेफ्टी फीचर्स को मोटर वाहन नियमों में शामिल करने पर जोर दिया था. फिलहाल ये फीचर्स सिर्फ कुछ एसयूवी और कारों में ही उपलब्ध हैं. गडकरी ने कहा, ये आधुनिक तकनीक सड़क सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी है, लेकिन अभी न तो ट्रकों में ये सिस्टम है और न ही बसों को इन आधुनिक तकनीक से लैस किया गया है. फिलहाल सरकार ने इन फीचर्स को शामिल किए जाने के बारे में कोई आधिकारिक ऐलान नहीं किया है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि इन फीचर्स को बड़े वाहनों में शामिल करना अनिवार्य कर दिया जाए तो यह कदम सड़क सुरक्षा के लिए मील का पत्थर साबित होगा.