

भाजपा के लिए 6 अप्रैल का दिन काफी खास है. इस दिन भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई थी. 45 साल पहले 6 अप्रैल 1980 को दिल्ली में भाजपा की स्थापना हुई थी. एक समय बीजेपी की सिर्फ दो सीटें आईं थीं. आज बीजेपी देश की सबसे बड़ी पार्टी है.
बीजेपी का एक नेता 11 सालों से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा है. भाजपा की स्थापना 1980 में हुई थी लेकिन इस पार्टी की जड़ें जनसंघ से जुड़ी हुई हैं. जनसंघ का स्थापना 1951 में हुई थी. 1980 में जनसंघ के सदस्यों ने भारतीय जनता पार्टी का गठन किया.
भाजपा आज जानी मानी पार्टी है. हर कोई बीजेपी को अच्छे से जानता है. कमल का फूल दिखते ही बीजेपी का ही जिक्र होता है. भाजपा और कमल एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं. पार्टी के नाम और चिन्ह को लेकर काफी रोचक किस्सा है. आइए इस बारे में जानते हैं.
BJP की स्थापना
भाजपा की स्थापना दोहरी सदस्यता के विवाद की वजह से हुई थी. आपातकाल के बाद जनसंघ के सदस्य जनता पार्टी के हिस्सा बन गए. देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. जनसंघ के सदस्य इसके हिस्सा रहे. 1980 में दोहरी सदस्यता की वजह से जनसंघ के सदस्यों को जनता पार्टी से निष्कासित कर दिया.
नई दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान में जनसंघ को दो दिन का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ. इसी अधिवेशन में 6 अप्रैल को भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ. भाजपा के संस्थापक सदस्यों में अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विजयराजे सिंधिया, नानाजी देशमुख, केआर मलकाणी, भैरों सिंह शेखावत और सिकंदर बख्त जैसे कई नेता शामिल रहे.
चुनाव चिन्ह
अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी के पहले अध्यक्ष बने. अटल बिहारी वाजपेयी ने अध्यक्षीय भाषण में कहा, हम अपनी नई पार्टी का निर्माण करते हुए भविष्य की ओर देखते हैं, पीछे नहीं. हम अपनी विचारधारा और सिद्धांतों के आधार पर आगे बढ़ेंगे. पार्टी के नाम और निशान को लेकर काफी चर्चा हुई. इसका जिक्र लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा माई लाइफ माई कंट्री में किया है.
नई पार्टी के नाम को लेकर पार्टी के सदस्यों में काफी चर्चा हुई. कुछ लोगों को लगता था कि इसे भारतीय जनसंघ कहा जाना चाहिए. अटल बिहारी वाजपेयी ने पार्टी के लिए भारतीय जनता पार्टी नाम दिया. भारी बहुमत से इस नाम का समर्थन हुआ. इस तरह से पार्टी का नाम पड़ा.
BJP का कमल
1980 में जनसंघ पार्टी भाजपा बन गई. जनसंघ पार्टी ने नया चिन्ह और झंडा भी अपनाया. जनसंघ के दीये की जगह कमल ने ले ली. झंडे में एक तिहाई हिस्सा हरा और दो तिहाई हिस्सा केसरिया रखा गया. साथ में झंडे में कमल का फूल बना था. यही भाजपा का चुनाव-चिन्ह है. लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा में चुनाव-चिन्ह को लेकर एक किस्से का जिक्र किया है.
लाल कृष्ण आडवाणी बताते हैं, 'हमने जनता पार्टी से अलग पहचान बना ली थी. इसलिए मतदाताओं के पास अलग चुनाव चिन्ह के साथ जाना जरूरी था. पार्टी को चुनाव आयोग के पास रजिस्टर कराने का समय नहीं था. न ही हम पार्टी के चुनाव चिन्ह पर लड़ सकते थे'. तब इस मुद्दे पर बात करने के लिए लाल कृष्ण आडवाणी पार्टी के कुछ नेताओं के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलने गए.
चुनाव चिन्ह
उस समय मुख्य चुनाव आयुक्त एस.एल. शकधर थे. शकधर ने कहा कि इस समय नई पार्टी को शामिल करना कठिन है क्योंकि चुनाव प्रकिया शुरू हो चुकी है. तब चुनाव आयुक्त शकधर ने आडवाणी को एक उपाय सुझाया. शकधर ने कहा कि जो चुनाव चिन्ह स्वतंत्र उम्मीदवारों के लिए हैं. आप उनमें से किसी एक को चुन सकते हैं. मैं आपके सभी उम्मीदवारों को वहीं चिन्ह अपनाने की परमिशन दे दूंगा.
स्वतंत्र उम्मीदवारों वाले चुनाव चिन्ह में कमल भी था. लाल कृष्ण आडवाणी ने कमल को चुना. चुनाव आयुक्त शकधर ने उसे लेने की अनुमति दे दी. आडवाणी आत्मकथा में बताते हैं कि हमने कमल इसलिए चुना क्योंकि इसे ही पार्टी के दिल्ली अधिवेशन में झंडे के लिए चुना गया था. इस तरह से बीजेपी का चुनाव चिन्ह कमल बन गया. 1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को सिर्फ दो सीटें मिलीं. आज वही कमल देश की राजनीति में खिला हुआ है.