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हिंदू-मुस्लिम एकता की अनोखी मिसाल! इस गांव में सभी लोग रखते हैं रोजा, होली भी मनाते हैं

शिरड गांव में करीब 40 से 50 हिंदू महिलाएं और पुरुष रोजा रखते हैं. वे सुबह सहरी (रोजा शुरू करने से पहले भोजन) करते हैं, दिनभर बिना कुछ खाए-पीए काम पर जाते हैं और शाम को इफ्तार (रोजा खोलने का समय) पर उपवास समाप्त करते हैं.

हिंदू-मुस्लिम एकता की अनोखी मिसाल (Representative Image) हिंदू-मुस्लिम एकता की अनोखी मिसाल (Representative Image)
हाइलाइट्स
  • सैकड़ों वर्षों से कायम है यह परंपरा

  • सभी त्योहार मिलकर मनाते हैं

देश में जहां कई जगहों पर सांप्रदायिक तनाव की खबरें आती रहती हैं, वहीं महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले का एक छोटा सा गांव शिरड हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बना हुआ है. यहां सदियों से दोनों समुदायों के लोग मिल-जुलकर रहते हैं और एक-दूसरे के त्योहारों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. इस गांव में न सिर्फ मुस्लिम, बल्कि हिंदू महिलाएं और पुरुष भी रमजान में रोजा रखते हैं.

सैकड़ों वर्षों से कायम है यह परंपरा
नांदेड़ जिले के हदगांव तहसील के शिरड गांव की आबादी लगभग 5000 है. इस गांव में स्थित फकीर बाबा की 1200 साल पुरानी दरगाह हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक मानी जाती है. मान्यता है कि यहां मन्नत मांगने से संतान प्राप्ति होती है. यही वजह है कि कई हिंदू महिलाएं रमजान के दौरान तीन दिन, पांच दिन या पूरे महीने रोजा रखती हैं और अपनी आस्था व्यक्त करती हैं.

कैसे निभाते हैं हिंदू रोजे की परंपरा?
शिरड गांव में करीब 40 से 50 हिंदू महिलाएं और पुरुष रोजा रखते हैं. वे सुबह सहरी (रोजा शुरू करने से पहले भोजन) करते हैं, दिनभर बिना कुछ खाए-पीए काम पर जाते हैं और शाम को इफ्तार (रोजा खोलने का समय) पर उपवास समाप्त करते हैं.

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गांव की निवासी निर्मलाबाई पाटिल बताती हैं, "मैं पिछले दस वर्षों से रोजा रख रही हूं. सुबह 5 बजे से पहले खाना बनाकर खा लेती हूं और फिर खेतों में काम करने चली जाती हूं. शाम को घर आकर इफ्तार करती हूं. यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है."

सिर्फ रमजान ही नहीं, सभी त्योहार मिलकर मनाते हैं
गांव के लोग सिर्फ रमजान ही नहीं, बल्कि होली, दिवाली, सप्ताह और ईद जैसे सभी त्योहार मिलकर मनाते हैं. गांव में रहने वाले अजगर शेख, विश्वनाथ फैगांवकर, दिलीप सुरवसे और नरेश शिराडकर बताते हैं कि यहां कभी भी हिंदू-मुस्लिम के बीच कोई विवाद नहीं हुआ. सभी लोग एक-दूसरे की आस्थाओं का सम्मान करते हैं.

शिरड गांव में धार्मिक सौहार्द की यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है. यहां के लोगों का मानना है कि फकीर बाबा के प्रति प्रेम और श्रद्धा के कारण यह एकता बनी हुई है. यही कारण है कि आज इस गांव की कहानी पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है.

(कुंवरचंद मंडले की रिपोर्ट)