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AI Robots अब करेंगे बॉर्डर की निगरानी, IIT गुवाहाटी में हुआ तैयार, Army कर रही फील्ड परीक्षण

आईआईटी गुवाहाटी में इनक्यूबेटेड स्टार्टअप दा स्पैटियो रोबोटिक लैबोरेट्री ने इन्हें तैयार किया है. फिलहाल इंडियन आर्मी इन रोबोट्स की फील्ड टेस्टिंग कर रही है ताकि इनकी इफेक्टिवनेस चेक की जा सके.

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हाइलाइट्स
  • IIT गुवाहाटी में Incubated Startup ने बनाया AI Robot!

  • ट्रेडिशनल Drones से बेहतर हैं AI Robot!

आईआईटी गुवाहाटी ने बॉर्डर सर्विलांस के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानि एआई से पावर्ड रोबोट्स डेवलप किए हैं, ये रोबोट्स मुश्किल भरे हालातों में भी रियल-टाइम मॉनिटरिंग कर सकते हैं. आईआईटी गुवाहाटी में इनक्यूबेटेड स्टार्टअप दा स्पैटियो रोबोटिक लैबोरेट्री ने इन्हें तैयार किया है. फिलहाल इंडियन आर्मी इन रोबोट्स की फील्ड टेस्टिंग कर रही है ताकि इनकी इफेक्टिवनेस चेक की जा सके. अगर ये टेस्ट सक्सेसफुल रहे, तो इन्हें बड़े स्केल पर डिप्लॉय किया जा सकता है. डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन, डीआरडीओ ने भी इस टेक्नोलॉजी की तारीफ की है और वो इसे भारत के डिफेंस सिस्टम्स में इंटिग्रेट करने का पोटेंशियल देख रहा है. ये step नेशनल सिक्योरिटी को स्ट्रॉन्ग करने की दिशा में होमग्रोन इनोवेशन का बड़ा एग्जाम्पल है, खासकर रॉग ड्रोन्स और इन्फिल्ट्रेशन जैसे थ्रेट्स के खिलाफ. है न कमाल की बात. आइए आज इस सैनिक रोबोट के बारे में ही बात करते हैं और समझते हैं इससे जुड़ी सभी डिटेल्स को...

IIT गुवाहाटी में Incubated Startup ने बनाया AI Robot!
इस रोबोट के स्पेसिफिकेशन्स की पूरी डिटेल्स पब्लिक नहीं हैं, लेकिन जो इन्फो उपलब्ध है, उसके बेसिस पर ये एडवांस्ड सेंसर्स (कैमरे, थर्मल इमेजिंग, मोशन डिटेक्टर्स), मशीन लर्निंग अल्गोरिदम्स और ऑटोनॉमस नेविगेशन सिस्टम्स से लैस हैं. ये 24/7 सर्विलांस कर सकता है, हार्श वेदर और टेरेन्स में काम कर सकते हैं, और ऑब्स्टेकल्स को खुद ही क्रॉस कर सकते हैं। इनकी पावरफुल बैटरी लाइफ और ड्यूरेबल बिल्ड (शायद रग्ड मटेरियल्स जैसे रीइन्फोर्स्ड मेटल्स) इन्हें ट्रेडिशनल ड्रोन्स या ह्यूमन पेट्रोल्स से बेहतर बनाती है। ये डेटा कलेक्ट करके रियल टाइम में एनालाइज करते हैं और सिक्योर चैनल्स से कंट्रोल रूम तक इन्फो भेजते हैं।

ट्रेडिशनल Drones से बेहतर हैं AI Robot!
DSRL को आईआईटी गुवाहाटी से मेंटरशिप और इन्फ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट मिला है, और गवर्नमेंट इनिशिएटिव्स जैसे आत्मनिर्भर भारत के तहत ये प्रोजेक्ट चल रहा है. डेवलपमेंट कॉस्ट शायद 50 लाख से 5 करोड़ रुपये प्रति प्रोटोटाइप तक हो सकती है, लेकिन लॉन्ग टर्म में ये ह्यूमन सोल्जर्स से सस्ते पड़ सकते हैं। अभी भारत इस फील्ड में इजरायल या साउथ कोरिया से पीछे है, जहां ऐसे रोबोट्स पहले से डिप्लॉय हैं, लेकिन DSRL जैसे इनिशिएटिव्स दिखाते हैं कि भारत फास्ट प्रोग्रेस कर रहा है. इसकी टेस्टिंग के बाद इससे जुड़ी और भी डिटेल्स सामने आ सकती हैं।

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इजरायल-साउथ कोरिया में पहले से Robot तैनात!
आज कई देश बॉर्डर सिक्योरिटी के लिए एआई रोबोट्स डैवलप करने की रेस में हैं. यूनाइटेड स्टेट्स, इजरायल, रूस, चाइना और साउथ कोरिया इस फील्ड में लीड कर रहे हैं. हां, ये रोबोट हमेशा दो हाथ और दो पैर के साथ दिखाई नहीं देते हैं, ये मशीनों के अलग अलग फॉर्म में होते हैं.

सबसे पहले बात करेंगे यूनाइटेड स्टेट्स की. यूएस डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी ने बॉर्डर मॉनिटरिंग के लिए ऑटोनॉमस रोबोट्स पर वर्क किया है. जनरल डायनामिक्स लैंड सिस्टम्स जैसी कंपनियां MUTT, मोबाइल ऑटोनॉमस टेरेस्ट्रियल जैसे रोबोट्स बना रही हैं. हालांकि, अभी बड़े स्केल पर इनका डिप्लॉयमेंट नहीं हुआ है, लेकिन लिमिटेड एरियाज में ट्रायल्स चल रहे हैं.

US-Israel रोबोट्स की रेस में बहुत आगे
इजरायल ने बॉर्डर सिक्योरिटी के लिए एआई टेक्नोलॉजी पहले ही डिप्लॉय कर दी है. इजरायल डिफेंस फोर्सेज यानि आईडीएफ लैवेंडर नाम के स्मार्ट सिस्टम और गार्डियम ऑटोनॉमस पेट्रोल व्हीकल्स का इस्तेमाल कर रही है, जो गाजा और लेबनान बॉर्डर्स पर मॉनिटरिंग करते हैं. इन्हें इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज जैसी फर्म्स ने डेवलप किया है. बात करें चाइना की, तो चाइना ने अपने बॉर्डर्स पर मॉनिटरिंग के लिए ड्रोन्स और स्मॉल ऑटोनॉमस रोबोट्स का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, खासकर भारत और म्यांमार से लगे बॉर्डर्स पर. इन्हें स्टेट-बैक्ड फर्म्स जैसे चाइना नॉर्थ इंडस्ट्रीज कॉरपोरेशन, नोरिन्को ने डैवलप किया है.

China रोबोट्स से कर रहा है बॉर्डर्स की मॉनिटरिंग! 
साउथ कोरिया भी इस मामले में पीछे नहीं है. साउथ कोरिया ने नॉर्थ कोरिया के साथ डीमिलिटराइज्ड जोन (डीएमजेड) में SGR-A1 सेंट्री रोबोट्स डिप्लॉय किए हैं, जो सैमसंग टेकविन (अब हानवा डिफेंस) ने बनाए हैं. ये मोशन डिटेक्शन और ऑटोमेटेड वेपन सिस्टम्स से लैस हैं. वहीं, रूस भी अपने बॉर्डर्स पर मॉनिटरिंग के लिए यूरेन-9 जैसे आर्म्ड रोबोट्स पर वर्क कर रहा है, जो मेनली स्टेट-बैक्ड डिफेंस फर्म रोसोबोरोनएक्सपोर्ट ने डेवलप किए हैं.

एआई रोबोट्स कैसे वर्क करते हैं?
एआई रोबोट्स में एडवांस्ड सेंसर्स, कैमरे, थर्मल इमेजिंग और मशीन लर्निंग अल्गोरिदम्स लगे होते हैं. ये सिस्टम्स रियल टाइम में डेटा कलेक्ट करते हैं और एनालाइज करके अनयूजुअल एक्टिविटीज डिटेक्ट करते हैं.
सेंसर्स एंड डेटा कलेक्शन: मोशन, साउंड और टेम्परेचर सेंसर्स रोबोट को अपने सराउंडिंग्स की इन्फो देते हैं.
मशीन लर्निंग: ये टेक्नोलॉजी रोबोट्स को नॉर्मल और सस्पिशियस एक्टिविटीज में डिफरेंस करना सिखाती है.
ऑटोनॉमी: ये रोबोट्स ह्यूमन इंटरवेंशन के बिना लंबे टाइम तक वर्क कर सकते हैं और डिसीजन्स ले सकते हैं.
कम्युनिकेशन: ये डेटा को कंट्रोल रूम तक भेजते हैं और वहां से इंस्ट्रक्शन्स रिसीव करते हैं.

कौन बना रहा है ये रोबोट्स? प्राइवेट कंपनियां या गवर्नमेंट फर्म्स?
प्राइवेट और गवर्नमेंट दोनों सेक्टर्स में ये वर्क हो रहा है. भारत में आईआईटी गुवाहाटी और डीआरडीओ गवर्नमेंट सपोर्ट के साथ वर्क कर रहे हैं, जबकि दा स्पैटियो रोबोटिक लैबोरेटरी एक स्टार्टअप है. यूएस में जनरल डायनैमिक्स और बोस्टन डायनैमिक्स जैसी प्राइवेट कंपनियां एक्टिव हैं. इजरायल और रूस में ज्यादातर गवर्नमेंट-बैक्ड डिफेंस फर्म्स हैं.

एआई रोबोट्स की इनिशियल कॉस्ट हाई है. एक एडवांस्ड रोबोट डेवलप करने में 50 लाख से 5 करोड़ रुपये तक खर्च हो सकता है, जिसमें रिसर्च, डिजाइन और प्रोटोटाइप शामिल हैं लेकिन लॉन्ग टर्म में ये कॉस्ट-इफेक्टिव हो सकते हैं. ह्यूमन सोल्जर की डिप्लॉयमेंट में सैलरी, ट्रेनिंग, फूड और मेडिकल खर्चे शामिल हैं, जो हर साल लाखों में हो सकते हैं. साथ ही ह्यूमन लाइफ का रिस्क अनमोल है. टेक्नोलॉजी सस्ती होने के साथ रोबोट्स की कॉस्ट कम हो सकती है.

इस रेस में भारत कहां स्टैंड करता है?
भारत अभी अर्ली स्टेज में है, लेकिन फास्ट प्रोग्रेस कर रहा है. आईआईटी गुवाहाटी और डीआरडीओ जैसे इंस्टिट्यूशन्स होमग्रोन टेक्नोलॉजी डेवलप कर रहे हैं. भारत ने अभी बड़े स्केल पर एआई रोबोट्स डिप्लॉय नहीं किए, लेकिन ट्रायल्स चल रहे हैं. टेक्निकल टैलेंट और रिसोर्सेज के साथ भारत जल्दी लीडर बन सकता है लेकिन इजरायल और साउथ कोरिया जैसे देशों से तुलना करें तो भारत को टेक्नोलॉजी और पॉलिसी लेवल पर अभी और वर्क करना है.

एआई रोबोट्स बॉर्डर सिक्योरिटी का फ्यूचर चेंज कर सकते हैं. आईआईटी गुवाहाटी का वर्क भारत के लिए इस डायरेक्शन में बड़ा स्टेप है. ग्लोबली कई नेशन्स इस टेक्नोलॉजी को अडॉप्ट कर रहे हैं, और भारत को भी जल्द अपनी पोजिशन स्ट्रॉन्ग करनी चाहिए. ये टेक्नोलॉजी न सिर्फ सिक्योरिटी बढ़ाएगी, बल्कि ह्यूमन सोल्जर्स को रिस्की मिशन्स से भी बचाएगी.