

क्या आपने हाल ही में ट्विटर पर कुछ ऐसी तस्वीरें देखी हैं जो आपको किसी सपनों की दुनिया में ले जाती हैं? प्यारे-प्यारे रंगों से सजी जादुई किरदारों से भरी ये तस्वीरें आजकल हर किसी की जुबान पर हैं. ये हैं स्टूडियो जिबली की कला की झलकियां, जो अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से इंटरनेट पर तहलका मचा रही हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये जिबली कला आखिर है क्या? कहां से आई? इसे किसने शुरू किया?
स्टूडियो जिबली क्या है? एक नाम जो बन गया किंवदंती
स्टूडियो जिबली जापान का एक ऐसा एनिमेशन स्टूडियो है, जिसने अपनी खास कहानियों और अनोखी कला से पूरी दुनिया को अपना दीवाना बना दिया. इसका नाम सुनते ही आपके दिमाग में शायद टोटोरो का प्यारा चेहरा या फिर "स्पिरिटेड अवे" की रहस्यमयी दुनिया आ जाए. लेकिन ये स्टूडियो सिर्फ फिल्में नहीं बनाता, ये सपने बुनता है ऐसे सपने जो बच्चों से लेकर बड़ों तक, हर किसी को अपनी ओर खींच लेते हैं.
1985 में शुरू हुआ ये स्टूडियो आज जापानी एनिमेशन की दुनिया का एक चमकता सितारा है. टोक्यो के कोगनेई में बसा इसका ऑफिस एक ऐसी जगह है, जहां हर फ्रेम को हाथों से रंगा जाता है, हर किरदार को जिंदगी दी जाती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई? और क्यों आज ट्विटर पर इसकी तस्वीरें वायरल हो रही हैं?
जिबली की शुरुआत
स्टूडियो जिबली की कहानी शुरू होती है तीन शख्सियतों से- हायाओ मियाजाकी, इसाओ ताकाहाता, और तोशियो सुज़ुकी. ये तीनों जापानी एनिमेशन की दुनिया के दिग्गज हैं, जिन्होंने मिलकर एक ऐसी विरासत बनाई, जो आज भी बरकरार है.
सबसे पहले बात करते हैं हायाओ मियाजाकी की, जिन्हें जिबली का असली जादूगर कहा जाता है. 5 जनवरी, 1941 को टोक्यो में जन्मे मियाजाकी ने बचपन से ही एनिमेशन के प्रति अपनी रुचि दिखाई. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अपने परिवार के साथ टोक्यो से बाहर निकाले गए मियाजाकी के अनुभवों ने उनकी कहानियों में गहरी छाप छोड़ी. 1963 में उन्होंने टोई एनिमेशन में काम शुरू किया, जहां उनकी मुलाकात इसाओ ताकाहाता से हुई. दोनों ने मिलकर कई प्रोजेक्ट्स पर काम किया, लेकिन असली क्रांति तब आई, जब 1984 में मियाजाकी की फिल्म "नॉसिका ऑफ द वैली ऑफ द विंड" रिलीज हुई. इस फिल्म की सफलता ने उन्हें एक नया स्टूडियो शुरू करने का हौसला दिया.
15 जून, 1985 को, टोक्यो की एक प्रकाशन कंपनी टोकुमा शोटेन के सपोर्ट से, मियाजाकी, ताकाहाता और प्रोड्यूसर तोशियो सुज़ुकी ने मिलकर स्टूडियो जिबली की नींव रखी. नाम "जिबली" इटैलियन शब्द से लिया गया, जिसका मतलब है "एक हवा". मियाजाकी को इटली और हवाई जहाजों से गहरा लगाव था, और उन्होंने इस नाम को इसलिए चुना क्योंकि वो एनिमेशन की दुनिया में एक नई हवा बहाना चाहते थे.
पहली फिल्म और शुरुआती सफलता
स्टूडियो जिबली की पहली आधिकारिक फिल्म थी "लापुता: कैसल इन द स्काई" (1986). इस फिल्म ने जापान में धूम मचा दी और जिबली को एक मजबूत शुरुआत दी. इसके बाद आई "माय नेबर टोटोरो" (1988) और "ग्रेव ऑफ द फायरफ्लाइज" (1988), जिन्होंने स्टूडियो की साख को और मजबूत किया. "माय नेबर टोटोरो" का किरदार टोटोरो आज जिबली का सबसे पहचानने योग्य प्रतीक बन चुका है. ये विशाल, प्यारा प्राणी, जो रैकून कुत्ते और बिल्ली का मिश्रण है, बच्चों और बड़ों के दिलों में बस गया.
लेकिन असली सफलता तब मिली, जब 1989 में "कीकीज डिलीवरी सर्विस" रिलीज हुई. इस फिल्म ने न सिर्फ जापान में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जिबली का नाम रोशन किया. ये कहानी एक युवा चुड़ैल की थी, जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष करती है. इस फिल्म ने दिखाया कि जिबली सिर्फ बच्चों के लिए नहीं, बल्कि हर उम्र के लोगों के लिए कहानियां बुन सकता है.
जिबली की कला- हाथों से रचा जादू
अब बात करते हैं उस चीज की, जिसके लिए जिबली आज ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा है- इसकी कला. जिबली की फिल्में ज्यादातर हाथों से बनाई जाती हैं. जहां आजकल ज्यादातर एनिमेशन स्टूडियो कंप्यूटर ग्राफिक्स (CGI) का इस्तेमाल करते हैं, वहीं जिबली ने पारंपरिक तरीकों को अपनाया. हर फ्रेम को हाथों से ड्रॉ किया जाता है, वॉटरकलर और ऐक्रेलिक पेंट्स से रंगा जाता है. ये तकनीक जिबली की फिल्मों को एक खास "हैंडमेड" अहसास देती है, जो उन्हें बाकियों से अलग करती है.
जिबली की कला में चमकीले रंग, प्रकृति की खूबसूरती, और यूरोपीय शैली का प्रभाव साफ दिखता है. हर सीन में बैकग्राउंड को इतना ध्यान से बनाया जाता है कि वो खुद एक कहानी कहता है. मियाजाकी का मानना था कि प्रकृति और इंसान का रिश्ता फिल्मों में झलकना चाहिए. यही वजह है कि उनकी फिल्मों में आपको हरे-भरे जंगल, नीले आसमान, और बहती नदियां बार-बार दिखती हैं.
हालांकि, एक अपवाद है- "द टेल ऑफ द प्रिंसेस कगुया" (2013). इस फिल्म में ताकाहाता ने पारंपरिक जापानी लोक कला से प्रेरित वॉटरकलर स्टाइल का इस्तेमाल किया, जो जिबली की आम शैली से अलग थी. ये फिल्म किरदारों की भावनाओं को उजागर करने के लिए बनाई गई थी, और इसकी सादगी ने इसे और खास बना दिया.
स्पिरिटेड अवे और ऑस्कर की जीत
1997 में आई "प्रिंसेस मोनोनोके" ने जिबली को एक नई ऊंचाई दी. ये फिल्म जापान में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी (हालांकि बाद में "टाइटैनिक" ने इसे पीछे छोड़ दिया). इस फिल्म ने पर्यावरण और इंसान के लालच जैसे गंभीर मुद्दों को उठाया, जो मियाजाकी की खासियत थी.
लेकिन असली जादू हुआ 2001 में, जब "स्पिरिटेड अवे" रिलीज हुई. ये फिल्म एक 10 साल की लड़की चिहिरो की कहानी थी, जो एक रहस्यमयी आत्माओं की दुनिया में फंस जाती है. इस फिल्म ने न सिर्फ जापान में बल्कि पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया. 2002 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन बेयर और 2003 में ऑस्कर में बेस्ट एनिमेटेड फीचर का अवॉर्ड जीतकर "स्पिरिटेड अवे" ने जिबली को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई. आज इसे 21वीं सदी की सबसे महान फिल्मों में गिना जाता है.
इसके बाद "हाउल्स मूविंग कैसल" (2004), "पोन्यो" (2008), और "द विंड राइज्स" (2013) जैसी फिल्मों ने जिबली की लोकप्रियता को और बढ़ाया. हर फिल्म में मियाजाकी की कहानी कहने की कला और प्रकृति के प्रति उनका प्यार साफ झलकता था.
ट्विटर पर जिबली का जलवा
अब आते हैं आज के दौर पर. मार्च 2025 में, OpenAI ने अपने GPT-4o मॉडल में एक नया फीचर लॉन्च किया- इमेज जेनरेशन. इस फीचर की मदद से यूजर्स अपनी तस्वीरों को जिबली स्टाइल में बदल सकते हैं. बस एक तस्वीर अपलोड करो, और AI उसे जिबली की जादुई दुनिया का हिस्सा बना देता है. नतीजा? ट्विटर पर जिबली स्टाइल की तस्वीरों की बाढ़ आ गई.
लोग अपनी फैमिली फोटोज, मीम्स, और ऐतिहासिक तस्वीरों को जिबली स्टाइल में बदलकर शेयर कर रहे हैं. बॉलीवुड फिल्मों के सीन से लेकर सलेब्रिटीज की तस्वीरें तक, हर चीज को "जिबली-फाई" किया जा रहा है. OpenAI के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने भी अपनी प्रोफाइल पिक्चर को जिबली स्टाइल में बदला, और ट्वीट किया, "मुझे एक दशक तक सुपरइंटेलिजेंस बनाने की कोशिश की, और अब लोग मुझे जिबली स्टाइल में देख रहे हैं."
लेकिन इस ट्रेंड ने एक बहस भी छेड़ दी. मियाजाकी ने 2016 में AI-जेनरेटेड एनिमेशन को "ज़िंदगी का अपमान" कहा था. एक पुराना वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वो AI से बनी एक जॉम्बी एनिमेशन को देखकर नाराजगी जताते हैं. कुछ लोग उनके विचारों से सहमत हैं, तो कुछ का कहना है कि ये पुराना वीडियो आज के संदर्भ से बाहर है.
दुनिया भर में फैला जादू
जिबली की फिल्में सिर्फ जापान तक सीमित नहीं रहीं. 1996 में वॉल्ट डिज्नी स्टूडियोज ने जिबली की फिल्मों के ग्लोबल डिस्ट्रीब्यूशन का अधिकार लिया, जिसके बाद ये फिल्में पश्चिमी देशों में भी पहुंचीं. "नो-एडिट्स" पॉलिसी के साथ डिज्नी ने इन फिल्मों को मूल रूप में पेश किया, जिससे जिबली की साख और बढ़ी.
2001 में मिताका, जापान में जिबली म्यूजियम खुला, जहां फैंस इन फिल्मों की दुनिया को करीब से देख सकते हैं. आज नेटफ्लिक्स और HBO मैक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स पर जिबली की फिल्में उपलब्ध हैं, जिसने इसकी पहुंच को और विस्तार दिया.
2013 में मियाजाकी ने फीचर फिल्मों से रिटायरमेंट की घोषणा की, लेकिन 2023 में "द बॉय एंड द हेरॉन" के साथ वापसी की, जिसने फिर से ऑस्कर जीता. आज भी जिबली नई पीढ़ी को प्रेरित कर रहा है, और ट्विटर पर वायरल तस्वीरें इसकी लोकप्रियता का सबूत हैं.