
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को तीन-दिवसीय दौरे के लिए श्रीलंका पहुंचे. यह प्रधानमंत्री मोदी की श्रीलंका की चौथी यात्रा है. इससे पहले वह 2019 में पड़ोसी देश गए थे. इस यात्रा के दौरान पीएम मोदी द्विपक्षीय संबंधों के कई पहलुओं पर श्रीलंकाई नेतृत्व के साथ बातचीत करेंगे. वह श्रीलंका में भारतीय मदद के तहत तैयार कई परियोजनाओं का उद्घाटन करेंगे.
इसके बाद पीएम मोदी रविवार को अनुराधापुरा भी जाएंगे. यहां वह जया श्री महाबोधि मंदिर में प्रार्थना करेंगे. इस मंदिर में लगा पेड़ करीब 2300 साल पुराना है. खास बात यह है कि इस पेड़ का गौतम बुद्ध से कनेक्शन है. और उन्हीं के जरिए भारत से भी गहरा संबंध है.
क्या है जया श्री महाबोधि मंदिर की कहानी?
जया श्री महा बोधि एक पवित्र वृक्ष है. यह गौतम बुद्ध से जुड़ी सबसे करीबी प्रामाणिक जीवित कड़ी है और इसकी तारीख दो सहस्राब्दी से भी पुरानी है. करीब 2600 साल पहले गौतम बुद्ध भारत के बोधगया में नेरंजना नदी के तट पर एक एसाथु (अश्वत्थ) वृक्ष के सहारे अपनी पीठ के बल बैठे थे. ऐसा कहा जाता है कि जब वे वृक्ष के सामने बैठे थे तब उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. ऐसा करने से वृक्ष को भी एक पूजनीय दर्जा प्राप्त हुआ.
इसे बोधि वृक्ष के रूप में जाना जाने लगा और बुद्ध के जीवनकाल में भी तीर्थयात्री इसे देखने आते थे. करीब 200 साल बाद जब राजा अशोक बौद्ध धर्म के अनुयायी बन गए तो उन्होंने इस पेड़ का एक हिस्सा काटकर अपनी बेटी संघमित्ता महाथेरी के हाथों श्रीलंका भेजा. वह अपने साथ इस पवित्र पेड़ की दक्षिणी शाखा ले गईं. यह शाखा औपचारिक रूप से श्रीलंका के सबसे शुरुआती राजाओं में से एक देवनम्पिया तिस्सा को भेंट की गई.
राजा देवनम्पिया ने लगाया यह पेड़
सन् 288 ईसा पूर्व में तिस्सा ने अनुराधापुरा में अपने रॉयल पार्क में बोधि वृक्ष की शाखा लगाई. इस पेड़ को जया श्री महा बोधि के नाम से पहचाना गया. इस वृक्ष की देखभाल और सुरक्षा बौद्ध भिक्षुओं और समर्पित राजाओं ने की है. सदियों से वृक्ष के चारों ओर मूर्तियां, नहरें, सुनहरी बाड़ और दीवारें बनाई गई हैं.
इस पवित्र पेड़ के नीचे बौद्ध कई मन्नतें मांगते और प्रसाद चढ़ाते आए हैं. कई बार इस पेड़ को गंभीर खतरों का सामना करना पड़ा है. कभी जंगली हाथियों तो कभी प्रकृति की मार के कारण. सन् 1907 और 1911 में दो तूफानों ने इस पेड़ की दो शाखाएं तोड़ दी थीं. सन् 1929 में एक उपद्रवी ने वृक्ष पर हमला किया और एक और शाखा को काट दिया. सन् 1985 में तमिल टाइगर अलगाववादियों ने इस स्थल पर धावा बोला और ऊपरी छत पर 146 सिंहली-बौद्धों की हत्या कर दी थी.
क्या हैं पेड़ से जुड़ी मान्यताएं?
इस द्वीप पर बौद्ध धर्म के लोगों में बोधि वृक्ष पर जाने और उसे श्रद्धांजलि देने की प्रथा रही है. दूर-दूर के गांवों से तीर्थयात्रियों के लिए अनुराधापुरा शहर में आना और श्री महा बोधि को श्रद्धांजलि देना एक वार्षिक प्रथा है. इस स्थल के देखरेख करने वाले शख्स भी रोजाना अलग-अलग तरह के प्रसाद चढ़ाते हैं.
इसके अलावा लोग संतान की प्राप्ति से लेकर अच्छी फसल तक के लिए इस पेड़ की पूजा करते हैं. आम तौर पर बौद्ध धर्म के लोगों का दृढ़ विश्वास है कि जया श्री महा बोधि को चढ़ाया गया प्रसाद उनके जीवन में महत्वपूर्ण और सकारात्मक बदलाव लाया है.