
अमेरिका 2 अप्रैल यानी आज से भारत समेत अपने प्रमुख व्यापारिक साझेदारों से निर्यात किए जाने वाले सामानों पर टैरिफ लगा रहा है. यह पारस्परिक टैरिफ होगा. भारत के अलावा यूरोपीय संघ, दक्षिण कोरिया और ब्राज़ील जैसे देशों पर भी पारस्परिक टैरिफ का असर पड़ने के आसार हैं. ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि भारत समेत कई देश अमेरिकी सामानों पर ज्यादा टैरिफ लगा रहे हैं.
दुनिया भर के उद्योग ट्रंप की टैरिफ नीति से परेशानी में हैं. भारत के टॉप पब्लिक पॉलिसी थिंक टैंक नीती आयोग ने कहा है कि पारस्परिक टैरिफ का भारतीय उद्योग पर मिला-जुला असर पड़ेगा. इस सबके बीच एक सवाल ज़हन में आता है और वह है कि आखिर यह 'टैरिफ' शब्द कब और कैसे अस्तित्व में आया जिसने आज दुनिया की नींदें उड़ा रखी हैं.
समुद्री व्यापारियों से मिला शब्द
लगभग 2,000 वर्ष पहले, जब रोमन साम्राज्य अपने चरम पर था, भूमध्य सागर के बाहर के बंदरगाहों से आने वाले व्यापारी जहाजों को अपने साथ लाए जाने वाले हर सामान पर एक मानक कर देना पड़ता था. कुछ ही शताब्दियों के भीतर, जब रोमनों ने अपना नियंत्रण खो दिया और पुरा क्षेत्र कुछ बिखरे हुए राज्यों और छोटे साम्राज्यों में बंट गया, तो व्यापारियों को बंदरगाह से बंदरगाह तक जाते समय कई तरह के शुल्कों का सामना करना पड़ा.
इसलिए, एक परंपरा विकसित हुई, जिसके तहत व्यापारियों को पहले से ही यह बता दिया जाता था कि प्रत्येक वस्तु पर कितना कर लगाया जाएगा. अरबों ने इसे ता'रिफे या अधिसूचना कहा. यह शब्द अन्य भाषाओं में भी फैल गया, स्पेनिश में टैरिफा, इतालवी में टैरिफा और बाद में अंग्रेजी में टैरिफ बन गया. टैरिफ एक तरह का टैक्स है जो आयातित सामान पर लगाया जाता है. जब कोई देश किसी देश से सामान आयात यानी इंपोर्ट करता है तो उस पर टैरिफ लगाया जाता है.
कैसे पड़ेगा इसका असर
सबसे पहले सवाल है कि आयात और निर्यात यानी इंपोर्ट और एक्सपोर्ट क्या है? जब हम किसी अन्य देश से कोई सामान खरीदते हैं तो उसे आयात यानी इंपोर्ट कहते हैं जैसे कि भारत में अमेरिका से कंप्यूटर आयात करना. और जब हम अपने देश में बनाए गए सामान को किसी अन्य देश को भेजते हैं तो उसे निर्यात यानी एक्सपोर्ट कहते हैं, जैसे कि भारत में बने कपड़े, अमेरिका को निर्यात करना.
अब मान ले कि भारत में एक कंपनी है जो कपड़े बनाती है और वो अपने कपड़े अमेरिका को भेजती है तो ये एक्सपोर्ट होगा. लेकिन जब वही कंपनी अमेरिका से कंप्यूटर खरीदती है तो ये इंपोर्ट कहलाता है. टैरिफ एक तरह का टैक्स है जो आयातित सामान पर लगाया जाता है. जब कोई देश किसी देश से सामान आयात यानी इंपोर्ट करता है तो उस पर टैरिफ लगाया जाता है. अब मान ले कि अमेरिका भारत से आयात करता है. इससे आयातित सामान की कीमत बढ़ जाती है और स्वदेशी उद्योग यानी इंडस्ट्रीज को फायदा होता है. मान ले अमेरिकी सरकार ने कपास पर 10% टैरिफ लगाया है. इसका मतलब है कि अगर अमेरिका ₹100 का कपास आयात करता है तो उसे ₹10 टैरिफ के रूप में देना होगा. इस तरह टैरिफ इंपोर्टेड सामान की कीमत बढ़ा देता है और स्वदेशी इंडस्ट्रीज को फायदा पहुंचाता है.
लेकिन ये व्यापार और अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक असर डाल सकता है. मान लें कि अमेरिका में एक कंपनी है जो विमान बनाती है. वह अपने विमान भारत को बेचती है तो यह अमेरिका के लिए निर्यात होगा. वहीं इस पर टैरिफ लगाया जाए तो भारत के लिए इसकी कीमत बढ़ जाएगी और अमेरिका को इसका फायदा होगा. और अमेरिका का टैरिफ बढ़ाना इसलिए भी भारत के लिए बड़ी चुनौती है क्योंकि पहले से ही अमेरिकी डॉलर के आगे रुपए की कीमत बेहद कम है. अगर अमेरिका में कोई प्रॉडक्ट 1 डॉलर का है और अमेरिका इसे भारत को बेचता है तो पहले तो भारत को उसके लिए ₹87 देने होंगे. अब इसके 10% टैरिफ भी ऐड कर दिया जाए तो सोचिए भारत में इस प्रॉडक्ट की कीमत कितनी ज्यादा बढ़ जाएगी.
Smoot-Hawley Tariff Act
ट्रंप के सत्ता में आते ही टैरिफ पर चर्चा शुरू हो गई थी. हालांकि, यह पहली बार नहीं है कि जब टैरिफ का खेल चल रहा है. करीब 100 साल पहले, 1930 में भी अमेरिकी ने ऐसा कदम उठाया था. इसे दुनियाभर में Smoot-Hawley Tariff Act के नाम से जाना जाता है. और यही एक्ट कारण था जिससे वैश्विक मंदी की शुरुआत हुई.
Smoot-Hawley Tariff Act, जिसे United States Tariff Act of 1930 भी कहा जाता है, अमेरिकी सरकार द्वारा व्यापारिक सुरक्षा नीति के तहत लाया गया था. इसका उद्देश्य अमेरिकी किसानों और उद्योगों को सस्ते विदेशी उत्पादों से बचाना था. इस कानून के तहत अमेरिका ने लगभग 20,000 वस्तुओं पर 40% से 60% तक का टैरिफ लगा दिया था. हालांकि, यह कदम अमेरिका के लिए फायदेमंद नहीं साबित हुआ. दूसरे देशों ने भी अमेरिका के उत्पादों पर भारी टैरिफ लगा दिए, जिसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय व्यापार लगभग 65% घट गया. इससे अमेरिकी निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ और अर्थव्यवस्था और भी ज्यादा मुश्किलों में घिर गई.
जब Smoot-Hawley Act लागू हुआ, अमेरिका पहले ही महामंदी के दौर से गुजर रहा था. लेकिन इस कानून ने संकट को और गहरा कर दिया. जैसे ही यह कानून लागू हुआ, अमेरिकी स्टॉक मार्केट में भारी गिरावट आई। विदेशी निवेशकों ने अमेरिकी शेयरों से पैसे निकालना शुरू कर दिया. जब दूसरे देशों ने अमेरिकी उत्पादों पर टैक्स बढ़ा दिया, तो अमेरिकी उद्योगों को भारी नुकसान हुआ. इसका असर नौकरियों पर पड़ा, और आयात महंगे होने के कारण अमेरिका में वस्तुओं के दाम बढ़ने लगे, जिससे बेरोजगारी से जूझ रहे लोगों के लिए जीवन कठिन हो गया. इस एक्ट ने दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी को और भी गंभीर बना दिया.
हालांकि, चार साल के भीतर ही Smoot-Hawley Act के प्रभाव को महसूस किया गया और अमेरिका ने अपनी पॉलिसी में बदलाव किया। 1934 में राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने Reciprocal Trade Agreements Act पर हस्ताक्षर किए, जिसने देशों के बीच व्यापारिक सहयोग को बढ़ावा देने और टैरिफ को कम करने का रास्ता बना. जैसे 1930 में हुआ था, वैसे ही इस बार भी अन्य देश अमेरिका के खिलाफ व्यापारिक प्रतिबंध लगा सकते हैं, जिसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.